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Desh - Videsh

Explainer: Iran Regime Change; भारत के लिए घातक संकट चाबहार, अफगानिस्तान और पाक-चीन काउंटर पर गहरा असर

The Janta NewsBy The Janta NewsJanuary 15, 2026
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Iran
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Iran Regime Change Explainer: ईरान में सत्ता परिवर्तन (Regime Change) को लेकर कई सारे भारतीय लोकतंत्र सेनानी बने हुए हैं और खामनेई सत्ता को चुनौती देने वाले आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं. लेकिन, अगर भारत और बतौर राष्ट्रवादी नज़रिए से देखा जाए, तो ईरान में खामनेई प्रशासन को हटाया जाना, भारत के लिहाज़ से क़तई सही नहीं है. तो सवाल गंभीर है कि क्या भारत के लिए ईरान में रेजीम चेंज होना घातक है? चलिए, एक-एक करके इस सवाल का जवाब तलाशते हैं. दरअसल, यह सवाल आज के भू-राजनीतिक परिदृश्य में बेहद प्रासंगिक है, खासकर जब ईरान में आर्थिक संकट, विरोध प्रदर्शन और क्षेत्रीय अस्थिरता चरम पर हैं.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों की नजर में, वर्तमान इस्लामिक रिपब्लिक की सरकार भारत के लिए एक रणनीतिक संपत्ति है. खामनेई के नेतृत्व वाली ईरान की वर्तमान सरकार एक ऐसी साझेदार है जो भूगोल, सुरक्षा और कनेक्टिविटी के मोर्चे पर पाकिस्तान और चीन के विस्तार को संतुलित करती है. और हम सभी जानते हैं कि पाकिस्तान पर पहले से ही अमेरिकियों का कंट्रोल है. इसका साफ़ उदाहरण ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दिखाई दिया, जब नूरखान एयरबेस पर भारतयी सेना ने मिसाइलें दागीं, तब अमेरिका को दखल देना पड़ा. साथ ही बांग्लादेश पर भी अमेरिकी सीआईए और पाकिस्तानी खूफिया एजेंसी आईएसआई का भरपूर दबदबा क़ायम हो गया है. ऐसे में ईरान में एक अचानक या हिंसक रेजीम चेंज लंबे समय तक अस्थिरता ला सकता है, जो भारत के हितों को गहरी चोट पहुंचाएगा.

सेंट्रल एशिया और अफगानिस्तान तक रणनीतिक पहल

  • अफ़ग़ानिस्तान के साथ भारत के रिश्ते इन दिनों व्यापारिक के साथ-साथ रणनीतिक रूप से भी काफ़ी अहम हो चुके हैं. तालिबान के साथ तालमेल के बाद भारत अब क़ायदे से पाकिस्तान को अफ़ग़ान सीमा से भी काउंटर करने की हैसियत रखता है. साथ ही सेंट्रल एशियाई मुल्कों तक भी भारत अपनी व्यापारिक पहुंच का विस्तार कर रहा है. लेकिन, ये सारी क़वायदें ईरान के चलते ही संभव हो पा रही हैं. क्योंकि, ईरान ही वह ट्रांजिट माध्यम है, जहां से भारत इन मुल्कों तक अपनी पकड़ बनाए हुए है. इस पहल में सबसे पहले, चाबहार बंदरगाह भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक उपलब्धि है. पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच नाकाम होने के कारण, ईरान ही भारत का एकमात्र व्यवहारिक पश्चिमी गलियारा है.
  • भारत ने शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल में भारी निवेश किया है. यह निवेश तक़रीबन 1 अरब डॉलर से अधिक का है, जिसके ज़रिए 10 साल का ऑपरेशन कॉन्ट्रैक्ट मिला हुआ है. यह बंदरगाह पाकिस्तान को बायपास कर अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान जैसे देशों से जोड़ता है. व्यापारिक रूप से इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के साथ मिलकर यह ट्रांजिट समय 40% और लागत 30% कम करता है.
  • यहीं नहीं, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के लिए ईरान एक बड़ी मुसीबत हमेशा से रही है. क्योंकि, कई सारे अंडरकवर ऑपरेशंस को अंजाम इस खित्ते से पहले भी दिया जा चुका है और आज भी गुंजाइश इस खित्ते में पाकिस्तान विरोधी अंडरकवर ऑपरेशन की बनी रहती है.
  • कुल मिलाकर एक रेजीम चेंज या लंबी अस्थिरता इन परियोजनाओं को खतरे में डाल देगी. जेएनयू के पूर्व रिसर्चर और ईरान मामलों के जानकार डॉक्टर ख़ालिद रजा खान बताते हैं कि पोस्ट-खामेनेई पावर स्ट्रगल में चाबहार अस्थिरता का शिकार बन सकता है. कनेक्टिविटी के लिए राजनीतिक स्थिरता, सुरक्षा गारंटी और लंबी अवधि की योजना जरूरी है.
  • अस्थिरता में कस्टम्स, ट्रांसपोर्ट और सिक्योरिटी व्यवस्था चरमरा सकती है, जिससे भारत का अफगानिस्तान मिशन—जिसमें मानवीय सहायता, व्यापार और प्रभाव शामिल है, बाधित हो जाएगा. तालिबान शासन के बावजूद, भारत ने चाबहार के जरिए अफगान व्यापार को बढ़ावा दिया है, लेकिन एक कमजोर या विखंडित ईरान में यह सब ठप पड़ सकता है.”

पाकिस्तान का काउंटर शिया राष्ट्र ईरान

ग़ौरतलब है कि वर्तमान ईरानी सरकार पाकिस्तान के लिए काउंटरवेट है. शिया-बहुल ईरान ने कभी पाकिस्तान की एंटी-इंडिया नैरेटिव को नहीं अपनाया. 1990 के दशक में, जब पाकिस्तान तालिबान को सपोर्ट कर रहा था, ईरान और भारत दोनों एंटी-तालिबान ताकतों के साथ थे. ईरान ने सुन्नी चरमपंथी ग्रुप्स का विरोध किया, जो भारतीय हितों को नुकसान पहुंचाते हैं. कश्मीर पर भी ईरान ने ओआईसी में पाकिस्तान के प्रस्तावों का विरोध किया. एक नई सरकार—खासकर सुन्नी-लीनिंग या गल्फ-अलाइंड पाकिस्तान के प्रभाव को बढ़ावा दे सकती है, जिससे अफगानिस्तान में पाकिस्तान का दबदबा मजबूत होगा.

चीन की सेंट्रल एशिया मंसूबे पर चोट

चीन को काउंटर करने में चाबहार अहम है. ग्वादर पोर्ट (पाकिस्तान में, चीन द्वारा विकसित) से सिर्फ 170 किमी दूर चाबहार भारत का जवाब है. यह अरब सागर और हिंद महासागर में चीनी नौसैनिक गतिविधियों पर नजर रखने का ठिकाना भी है. रेजीम चेंज में चीन का प्रभाव और बढ़ सकता है, जिससे भारत की उपस्थिति कमजोर होगी. ट्रेड के मोर्चे पर भी नुकसान होगा. भारत-ईरान व्यापार $1.6-1.7 बिलियन का है, जिसमें भारत का सरप्लस है. लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि ईरान के साथ भारत का रणनीतिक महत्व व्यापार से कहीं ज्यादा है.

संक्षेप में कहा जाए तो वर्तमान ईरानी सरकार भारत के लिए प्रेडिक्टेबल पार्टनर है. भले ही नाता परफेक्ट न हो. लेकिन यह पाकिस्तान की “स्ट्रैटेजिक डेप्थ” को चैलेंज करती है, चीन के BRI को बैलेंस करती है और भारत को मध्य एशिया तक पहुंच देती है. रेजीम चेंज से उत्पन्न अस्थिरता भारत के लिए घातक साबित होगी. काफ़ी हद तक चांस ये बनेंगे कि चाबहार ठप हो जाए, अफगान मिशन कमजोर पड़ जाए और पाक-चीन एक्सिस को मज़बूती मिल जाए. फ़िलहाल, नई दिल्ली की “वेट एंड वॉच” नीति इसी सच्चाई को दर्शाती है.

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