हाल ही में सोशल मीडिया पर अभिनेता आमिर खान और उनके परिवार की कुछ आधुनिक परिधानों में तस्वीरें वायरल हुईं, जिनमें उनकी बेटी की ड्रेसिंग स्टाइल को लेकर कोई खास विवाद नहीं हुआ। लेकिन इसी घटना ने एक बार फिर समाज में व्याप्त दोहरे मापदंडों और वर्ग आधारित धार्मिक नैतिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जहां एक ओर सेलिब्रिटी परिवारों की आधुनिक जीवनशैली को ‘फैशन’ और ‘आधुनिकता’ का प्रतीक माना जाता है, वहीं दूसरी ओर यदि कोई सामान्य या आर्थिक रूप से पिछड़ा मुस्लिम परिवार अपनी बेटियों को इसी तरह की स्वतंत्रता देता है, तो उन्हें समाज के कठोर सवालों और आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है।
दोहरा मापदंड: धर्म बनाम हैसियत
समाज में यह धारणा गहराई से बैठी हुई है कि गरीब और मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवारों की बेटियों के लिए हिजाब और बुर्का ‘फर्ज़’ है, पर्दा ‘इज्जत’ है और चुप रहना ‘संस्कार’। लेकिन जब यही नियम अमीर और प्रभावशाली परिवारों पर लागू होते हैं, तो उन्हें ‘पर्सनल चॉइस’ और ‘फैशन स्टेटमेंट’ का नाम दे दिया जाता है।
धार्मिक कट्टरता और सामाजिक नैतिकता का यह दोहरा चेहरा तब और उजागर होता है जब एक ही कार्य को अलग-अलग वर्गों के लिए अलग-अलग चश्मे से देखा जाता है। गरीब की बेटी अगर खुले कपड़े पहने तो उस पर फतवे जारी हो जाते हैं, चरित्र पर सवाल उठते हैं, और कभी-कभी तो परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा तक दांव पर लग जाती है।
आज़ादी सबकी होनी चाहिए
यह सवाल अब और भी प्रासंगिक हो गया है: क्या धर्म और संस्कृति की व्याख्या केवल कमजोर वर्गों पर लागू होती है? क्या आज़ादी और आधुनिकता सिर्फ अमीरों का विशेषाधिकार है? यदि हिजाब और पर्दा धार्मिक रूप से अनिवार्य हैं, तो यह नियम सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए। और यदि खुले विचार और पहनावे को आज़ादी का प्रतीक माना जाता है, तो यह अधिकार हर वर्ग की महिलाओं को मिलना चाहिए — चाहे वह किसी भी आर्थिक या सामाजिक पृष्ठभूमि से हों।
निष्कर्ष
यह बहस केवल कपड़ों या फैशन की नहीं है, बल्कि यह उस गहरे सामाजिक अन्याय की ओर इशारा करती है, जहां धर्म और संस्कृति का उपयोग अक्सर सत्ता और वर्ग विशेष के हितों की रक्षा के लिए किया जाता है। जब तक समाज में समानता की भावना नहीं आएगी, तब तक यह पाखंड और भेदभाव जारी रहेगा।
कड़वा है… पर यही सबसे बड़ा सच है।








