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देश की पहली महिला शिक्षिका थीं ‘सावित्री बाई फुले’, समाज से छुआछूत मिटाने के लिए लड़ी लंबी लड़ाई

The Janta NewsBy The Janta NewsJanuary 3, 2025
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आज 3 जनवरी को, भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की 194वीं जयंती मनाई जा रही है। महाराष्ट्र के सतारा में जन्मी सावित्रीबाई ने महिलाओं और बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान दिया। उन्होंने विधवाओं के उत्थान के लिए भी अथक प्रयास किए। आज भी, सावित्रीबाई फुले को एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने समाज में महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाई।

एक जमाने में जब महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैद रखा जाता था, सावित्रीबाई फुले ने समाज के रूढ़िवादी मान्यताओं को चुनौती देते हुए नारी सशक्तिकरण का बिगुल बजाया। महज नौ वर्ष की उम्र में विवाह बंधन में बंधी सावित्रीबाई ने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर समाज सुधार के लिए कई बड़े काम किए। सावित्रीबाई ने औरतों के हक के लिए बहुत लड़ाई लड़ी। उन्होंने सिर्फ औरतों के लिए ही नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए भी आवाज उठाई जिन्हें समाज में कमतर समझा जाता था।

उन्होंने जाति-पाति, छुआछूत और विधवाओं के साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ खड़े होकर बात की। सावित्रीबाई ने गरीबों और औरतों को पढ़ाने के लिए स्कूल खोले। उन्होंने लोगों को यह समझाना चाहा कि सब बराबर हैं और किसी को कम नहीं समझना चाहिए। सावित्रीबाई सिर्फ समाज सेवा करने वाली महिला ही नहीं थीं, बल्कि वे बहुत अच्छी कवि भी थीं। अपनी कविताओं के जरिए उन्होंने लोगों को समाज की बुराइयों के बारे में बताया।

सावित्रीबाई ने समाज को बेहतर बनाने के लिए बहुत सारे काम किए। लेकिन इन कामों की वजह से उन्हें अपने घर से भी दूर रहना पड़ा। जो लोग खुद को बड़े समझते थे, वे सावित्रीबाई के कामों को पसंद नहीं करते थे। वे हमेशा सावित्रीबाई का मजाक उड़ाते थे और उन्हें नीचा दिखाते थे। जब सावित्रीबाई घर से बाहर जाती थीं, तो उन्हें पता होता था कि लोग उन पर कीचड़ फेंक सकते हैं, इसलिए वे हमेशा एक सेट कपड़े और बदलने के लिए पानी साथ लेकर जाती थीं।

सावित्रीबाई चाहती थीं कि सभी लोग बराबर हों। इसलिए उन्होंने अपने घर में एक कुआं खुदवाया ताकि सभी लोग उसमें पानी पी सकें। इससे लोगों को यह समझने में मदद मिलती कि सभी लोग बराबर हैं। सावित्रीबाई बहुत ही समझदार महिला थीं और वे कविताएं भी लिखती थीं। उनकी कविताएं प्रकृति और लोगों के बारे में थीं। वे यह बताना चाहती थीं कि सभी लोगों को बराबर का अधिकार मिलना चाहिए और जाति प्रथा खत्म होनी चाहिए।

महाराष्ट्र में बहुत पहले, 1875 से 1877 के बीच बहुत बड़ा अकाल पड़ा था। लोग खाने-पीने की चीज़ें नहीं पा रहे थे और बहुत बीमार पड़ रहे थे। सावित्रीबाई नाम की एक बहुत अच्छी महिला थीं। उन्होंने सत्यशोधक समाज नाम के एक समूह का नेतृत्व किया। इस समूह के लोगों ने बहुत सारे बीमार लोगों की मदद की। सत्यशोधक समाज के लोग बिना किसी पंडित या पुजारी के शादियां करवाते थे। उन्हें दहेज लेने-देने का भी विरोध था।

कुछ साल बाद, 1896 में फिर से महाराष्ट्र में बहुत बड़ा अकाल पड़ा। इस दौरान सावित्रीबाई को पता चला कि उनके दोस्त पांडुरंग बाबाजी गायकवाड़ का बेटा बहुत बीमार है। सावित्रीबाई तुरंत उनके पास गईं और बीमार बच्चे को अपनी पीठ पर उठाकर डॉक्टर के पास ले गईं। इस दौरान खुद सावित्रीबाई भी बीमार हो गईं। उन्हें प्लेग नाम की बीमारी हो गई थी। इसी बीमारी की वजह से 10 मार्च, 1897 को सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया।

पहले के जमाने में अगर किसी महिला का पति मर जाता था, तो उसके सिर के बाल मुंडवा दिए जाते थे। सावित्रीबाई फुले इस बात से बहुत दुखी होती थीं। उन्होंने सोचा कि ऐसा करना गलत है। इसलिए उन्होंने एक बहुत ही अच्छा तरीका निकाला। उन्होंने उन लोगों से बात की जो बाल काटते थे और उनसे कहा कि वे विधवाओं के बाल न काटें। उन्होंने उन लोगों को समझाया कि ऐसा करना गलत है। कई घर वाले अपने बच्चों को पढ़ाई नहीं करने देते थे। सावित्रीबाई फुले चाहती थीं कि सभी बच्चे पढ़े-लिखें। इसलिए वे उन बच्चों को पैसे देती थीं जो स्कूल जाते थे। इससे बच्चों को पढ़ाई करने में मदद मिलती थी।

 

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