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Made in Mumbai: 55,719 करोड़ के निवेश से बनेगा भारत का ग्लोबल शिपबिल्डिंग हब, मुंबई बनेगा समुद्री विकास का नया केंद्र

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भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई अब वैश्विक समुद्री उद्योग का केंद्र बनने की दिशा में कदम बढ़ा चुकी है। महाराष्ट्र सरकार ने ‘मेड इन मुंबई शिपबिल्डिंग इनिशिएटिव’ के तहत कुल ₹55,719 करोड़ के निवेश समझौतों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस ऐतिहासिक समझौते से न केवल राज्य में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे बल्कि भारत को वैश्विक शिपिंग और समुद्री उत्पादन हब बनाने की दिशा में बड़ी छलांग मिलेगी।

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‘मेड इन मुंबई’ पहल से भारत को नई पहचान

‘मेड इन मुंबई’ पहल का उद्देश्य भारत को आत्मनिर्भर बनाना और शिपबिल्डिंग सेक्टर में विदेशी निर्भरता को कम करना है। इस योजना के अंतर्गत आधुनिक जहाजों, कार्गो वेसल्स, और समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण पर फोकस किया जाएगा।राज्य सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले 5 वर्षों में मुंबई को “एशिया का शिपबिल्डिंग हब” बनाया जाए।

55,719 करोड़ के निवेश से खुलेगा रोजगार का नया रास्ता

घोषित निवेश के तहत कई निजी और सरकारी कंपनियां मुंबई, रत्नागिरी, और नवी मुंबई में शिपयार्ड, डॉकिंग फैसिलिटी, और रिपेयरिंग यूनिट्स स्थापित करेंगी। इससे लगभग 2 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने की संभावना है। उद्योग मंत्री ने कहा कि यह प्रोजेक्ट “मेक इन इंडिया” और “ब्लू इकॉनॉमी मिशन” को मजबूती देगा।

समुद्री ढांचे में बड़े बदलाव की तैयारी

नई पहल के तहत मुंबई पोर्ट ट्रस्ट और महाराष्ट्र मेरीटाइम बोर्ड मिलकर आधुनिक तकनीकों का उपयोग करेंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन से लैस शिपबिल्डिंग तकनीकें अपनाई जाएंगी, जिससे भारत की उत्पादन क्षमता और निर्यात बढ़ेगा।इसके अलावा, ग्रीन शिपिंग टेक्नोलॉजी पर भी काम किया जाएगा ताकि पर्यावरण संरक्षण के साथ विकास हो सके।

भारत की ब्लू इकॉनॉमी को मिलेगी रफ्तार

ब्लू इकॉनॉमी यानी समुद्र आधारित उद्योगों में भारत पहले से तेजी से निवेश कर रहा है। ‘मेड इन मुंबई’ पहल से भारत की हिस्सेदारी अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार में बढ़ेगी। सरकार का लक्ष्य है कि अगले दशक में भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था का आकार 500 अरब डॉलर तक पहुंचाया जाए।

देश की आत्मनिर्भरता की ओर बड़ा कदम

‘मेड इन मुंबई’ न सिर्फ एक औद्योगिक योजना है, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। इस प्रोजेक्ट से भारत अपनी शिपिंग जरूरतों को खुद पूरा करेगा और विदेशी निर्भरता कम करेगा। यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “वोकल फॉर लोकल” विजन को भी सशक्त बनाएगी।

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