World New Map: दुनिया का नक्शा अब आपको थोड़ा बदला-बदला नजर आ सकता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने शुक्रवार को एक अहम प्रस्ताव पास किया है। इसके तहत दुनिया का नक्शा ऐसे तरीके से दिखाने को बढ़ावा दिया जाएगा, जिसमें देशों और महाद्वीपों का असली आकार ज्यादा सही नजर आए। प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने वोट किया, जबकि 6 देश वोटिंग से दूर रहे और अमेरिका ने इसके खिलाफ वोट किया।
लेकिन यहां सबसे जरूरी बात ये है कि जमीन पर कुछ नहीं बदलेगा। न किसी देश का क्षेत्रफल बदलेगा और न ही सीमाएं। बस नक्शे पर देशों का आकार थोड़ा अलग नजर आएगा। अफ्रीका बड़ा दिखेगा, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका छोटे नजर आएंगे। तो भारत पर इसका क्या असर होगा, समझते हैं।
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UN ने दुनिया का नक्शा बदलने का प्रस्ताव क्यों पास किया?
संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया के नक्शे को लेकर ये प्रस्ताव इसलिए पास किया है, क्योंकि जिस नक्शे का इस्तेमाल हम लंबे समय से करते आ रहे हैं, उसमें कई देशों और महाद्वीपों का आकार सही नजर नहीं आता। खासकर अफ्रीका असल में जितना बड़ा है, उससे काफी छोटा दिखाई देता है। ये प्रस्ताव टोगो की तरफ से आगे बढ़ाया गया और अफ्रीकी देशों के साथ अफ्रीकी संघ ने भी इसका समर्थन किया। मकसद ये है कि दुनिया को ऐसे नक्शे पर दिखाया जाए, जिसमें देशों और महाद्वीपों का आकार उनकी असली जमीन के ज्यादा करीब हो। हालांकि इसका मतलब ये नहीं है कि दुनिया की जमीन या देशों की सीमाएं बदल रही हैं।
नए Equal Earth Map में क्या बदलेगा?
अब बात करते हैं नए Equal Earth Projection की। आसान भाषा में समझें तो इस नक्शे में देशों और महाद्वीपों का आकार उनकी असली जमीन के हिसाब से ज्यादा सही दिखता है। इसका सबसे बड़ा फर्क अफ्रीका में नजर आएगा। अफ्रीका पुराने नक्शे के मुकाबले काफी बड़ा दिखाई देगा। वहीं यूरोप और उत्तरी अमेरिका जैसे इलाके पहले से छोटे नजर आएंगे। ध्रुवों के पास मौजूद इलाके भी पुराने नक्शे की तुलना में कम खिंचे हुए दिखाई देंगे। यानी बदलाव सिर्फ नक्शे पर होगा। असल दुनिया में कुछ भी नहीं बदलेगा। न किसी देश की जमीन बढ़ेगी और न ही कोई सीमा इधर से उधर होगी।
भारत पर नए नक्शे का क्या असर होगा?
अब सबसे बड़ा सवाल- भारत पर इसका क्या असर होगा? तो इसका सीधा जवाब है कि भारत का क्षेत्रफल और सीमाएं बिल्कुल नहीं बदलेंगी। हां, नए नक्शे पर भारत का आकार थोड़ा अलग दिखाई दे सकता है। इसकी वजह ये है कि मर्केटर नक्शे में भूमध्य रेखा से दूर जाने वाले इलाके ज्यादा बड़े दिखाई देते हैं। भारत भूमध्य रेखा से बहुत दूर नहीं है, इसलिए उस पर इसका असर बहुत ज्यादा नहीं होगा। लेकिन जब भारत की तुलना रूस, कनाडा या यूरोप जैसे ज्यादा उत्तरी इलाकों से करेंगे, तो भारत नए नक्शे में अपने असली आकार के मुकाबले ज्यादा सही और कुछ बड़ा दिखाई दे सकता है।
मर्केटर मैप में आखिर दिक्कत क्या थी?
जिस मर्केटर मैप को हम लंबे समय से देखते आ रहे हैं, उसे 1569 में जेरार्डस मर्केटर ने बनाया था। इस नक्शे की एक बड़ी खासियत ये है कि समुद्र में जहाजों के रास्ते और दिशाएं समझने में ये काफी काम आता है। लेकिन इसमें एक दिक्कत है। जैसे-जैसे आप भूमध्य रेखा से दूर जाते हैं, वहां के इलाके नक्शे पर जरूरत से ज्यादा बड़े दिखाई देने लगते हैं। यानी असली जमीन और नक्शे पर दिखने वाली जमीन में फर्क आ जाता है। यही वजह है कि ग्रीनलैंड, कनाडा और रूस जैसे उत्तरी इलाके नक्शे पर असल से काफी बड़े नजर आते हैं।
ग्रीनलैंड और अफ्रीका से समझिए पूरा मामला
इस पूरे मामले को समझने का सबसे आसान उदाहरण है- ग्रीनलैंड और अफ्रीका। पुराने मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड और अफ्रीका कई बार लगभग एक जैसे बड़े दिखाई देते हैं। लेकिन असल में दोनों के बीच जमीन के आकार का बहुत बड़ा फर्क है। ग्रीनलैंड करीब 22 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है, जबकि अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका ग्रीनलैंड से कई गुना बड़ा है। लेकिन नक्शे पर दोनों को देखने पर ये अंतर उतना साफ नहीं दिखता। Equal Earth जैसे नक्शे में यही फर्क ज्यादा सही तरीके से दिखाई देता है।




