भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी को नई ऊर्जा मिलने वाली है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रस्तावित भारत दौरे से पहले रूस ने बड़ी कूटनीतिक पहल करते हुए भारत-रूस Reciprocal Exchange of Logistics Support Agreement (RELOS) को मंजूरी देने की दिशा में तेजी से काम शुरू कर दिया है। यह समझौता दोनों देशों के रक्षा संबंधों को और मजबूत करेगा।
RELOS एक महत्वपूर्ण सैन्य लॉजिस्टिक्स समझौता है, जिसके तहत: दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों, ईंधन, मरम्मत सुविधा और सप्लाई का उपयोग कर सकेंगी। नौसेना के जहाज एक-दूसरे के बंदरगाहों पर रिफ्यूलिंग और टेक्निकल सपोर्ट पा सकेंगे। संयुक्त अभ्यास, आपदा राहत और सामरिक मिशनों के दौरान सहयोग और तेज होगा।विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक पहुंच को और मजबूत करेगा।
पिछले वर्ष से लंबित इस समझौते पर अब रूस खुद सक्रियता दिखा रहा है।
पुतिन की यात्रा से पहले—RELOS को फाइनल रूप देने पर टॉप लेवल चर्चा , रक्षा मंत्रालयों के बीच ड्राफ्ट पर सहमति , दोनों देशों की नौसेनाओं के लिए नई सप्लाई चैन का मार्ग प्रशस्त यह संकेत है कि रूस भारत को एशिया में अपना प्रमुख रणनीतिक साझेदार बनाए रखना चाहता है।
भारत पहले ही अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर सहित कई देशों के साथ इसी तरह के लॉजिस्टिक्स समझौते कर चुका है। रूस के साथ RELOS होने पर भारत को मिलेगा: आर्कटिक और फार ईस्ट में सामरिक पहुंच , रूस के आर्कटिक पोर्ट्स और सैन्य ठिकानों का उपयोग , रूस की नौसैनिक क्षमताओं के साथ बेहतर समन्वय , हिंद महासागर और प्रशांत क्षेत्र में मिशन और अभ्यासों में तेजी |
रूस की इस पहल को पुतिन के प्रस्तावित भारत दौरे के बड़े एजेंडा का हिस्सा माना जा रहा है। अनुमान है कि इस यात्रा के दौरान: रक्षा सहयोग , परमाणु ऊर्जा परियोजनाएं , आर्थिक और ऊर्जा व्यापार , नए भू-राजनीतिक समीकरणों पर बातचीत जोर दिया जाएगा।रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि RELOS की मंजूरी भारत-रूस संबंधों में “रणनीतिक पुनर्संतुलन” का संकेत है। अमेरिका-चीन तनाव, यूक्रेन युद्ध और एशिया-प्रशांत में बदलते समीकरणों के बीच दोनों देशों के लिए यह सहयोग लाभकारी साबित होगा।

