भारत और रूस के बीच दशकों पुरानी दोस्ती एक नए मोड़ पर पहुँचने वाली है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर इन दिनों रूस के दौरे पर हैं, जहाँ वे आने वाले 23वें वार्षिक भारत-रूस शिखर सम्मेलन की तैयारियों का जायज़ा ले रहे हैं। इस यात्रा को दोनों देशों के बीच रणनीतिक, आर्थिक और रक्षा संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
भारत-रूस साझेदारी का नया अध्याय
जयशंकर की यह यात्रा ऐसे समय पर हो रही है जब विश्व राजनीति में बड़े बदलाव देखे जा रहे हैं। भारत और रूस दोनों ही अपने पारंपरिक संबंधों को और मज़बूत करते हुए ऊर्जा, व्यापार, और रक्षा क्षेत्र में नई संभावनाओं की तलाश में हैं। भारत ने हमेशा रूस को अपने विश्वसनीय सहयोगी के रूप में देखा है, और यह दौरा उसी भरोसे को एक नई ऊँचाई देने वाला है।
द्विपक्षीय वार्ता और निवेश पर चर्चा
इस यात्रा के दौरान जयशंकर की मुलाकात रूस के शीर्ष अधिकारियों से हो रही है, जहाँ तेल और गैस क्षेत्र में निवेश, रक्षा उपकरणों के निर्माण में सहयोग, और शिक्षा व तकनीक में साझेदारी जैसे मुद्दों पर चर्चा की जा रही है। इसके अलावा, दोनों देश रुपया-रूबल व्यापार प्रणाली को और प्रभावी बनाने पर भी विचार कर रहे हैं, जिससे डॉलर पर निर्भरता कम हो सके।
वैश्विक मंच पर भारत-रूस की भूमिका
जयशंकर की इस यात्रा का एक उद्देश्य यह भी है कि भारत और रूस मिलकर वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति को और मज़बूत करें। दोनों देश BRICS और SCO जैसे मंचों पर पहले से ही मिलकर काम कर रहे हैं। अब यह यात्रा इन संबंधों को और गहराई देने का अवसर लेकर आई है।
शांति, स्थिरता और रणनीतिक सहयोग की दिशा में कदम
भारत लगातार यह संदेश दे रहा है कि वह वैश्विक शांति और स्थिरता का पक्षधर है। जयशंकर की रूस यात्रा इसी सोच को आगे बढ़ाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा आने वाले महीनों में होने वाले शिखर सम्मेलन के लिए एक मजबूत नींव तैयार करेगा और भारत-रूस के रिश्तों में नई जान फूंकेगा।








