पश्चिम बंगाल में 15 साल की सत्ता गंवाने के बाद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इन दिनों अपने सबसे गंभीर आंतरिक संकट से गुजर रही है। हालिया 2026 के विधानसभा चुनावों में करारी हार के ठीक बाद पार्टी के अंदर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, जिसे ‘साइनगेट’ का नाम दिया जा रहा है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में जमा किए गए कुछ आधिकारिक दस्तावेजों पर टीएमसी के ही कई विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर होने के आरोप लगे हैं। इस मामले ने पार्टी के भीतर की गुटबाजी को उजागर कर दिया है और सीआईडी (CID) जांच शुरू हो गई है।
क्या है ‘साइनगेट’ या फर्जी हस्ताक्षर विवाद?
यह पूरा विवाद 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और पार्टी के मुख्य सचेतक (व्हिप) की नियुक्ति के लिए सौंपे गए दस्तावेजों को लेकर है।
आरोप है कि विधानसभा में जमा किए गए इन दस्तावेजों पर टीएमसी के कई विधायकों के जो हस्ताक्षर हैं, वे या तो फर्जी हैं या विधायकों की उचित सहमति के बिना किए गए हैं।
कैसे खुला राज?
टीएमसी के वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने का समर्थन करने वाले एक पत्र में हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता पर सबसे पहले टीएमसी विधायक रितब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने सवाल उठाए और शिकायत की, जिसके बाद यह मामला गरमा गया।
CID जांच और अब तक का एक्शन
विधायकों की शिकायत के बाद विधानसभा सचिव ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कराई। इसके बाद, पश्चिम बंगाल क्राइम इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) ने मामले की औपचारिक जांच शुरू कर दी है। जांचकर्ता उन विधायकों के बयान दर्ज कर रहे हैं और हस्ताक्षरों के नमूने ले रहे हैं, जिनके नाम विवादित दस्तावेजों पर हैं। कई टीएमसी विधायकों के बयान दर्ज भी किए जा चुके हैं।
टीएमसी के लिए क्यों बन गई है फजीहत?
इस विवाद ने हमेशा से नेतृत्व के कड़े नियंत्रण में रहने वाली टीएमसी के अंदरूनी कलह को पूरी तरह से सड़क पर ला दिया है।
शिकायत करने वाले विधायक निष्कासित: हस्ताक्षर पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाने के तुरंत बाद, टीएमसी ने रितब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाते हुए पार्टी से निकाल दिया।
अभिषेक बनर्जी को समन: इस जांच की आंच पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक भी पहुंच गई है। सीआईडी ने मामले की जांच के सिलसिले में टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को भी समन भेजा है।
अनुशासन पर उठे सवाल: बैठकों में विधायकों का गैरहाजिर रहना और नेताओं के बीच सार्वजनिक मतभेद पार्टी की एकजुटता और नेतृत्व के अधिकारों पर सीधा सवाल खड़े कर रहे हैं।
चुनाव हारने के ठीक बाद आया दोहरा संकट
हस्ताक्षर फर्जीवाड़े का यह विवाद टीएमसी के लिए ऐसे समय में गले की फांस बना है जब पार्टी को 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हाथों करारी शिकस्त झेलनी पड़ी है। इस चुनाव में पहली बार बंगाल में बीजेपी ने सरकार बनाई और ममता बनर्जी का 15 साल का राज खत्म हो गया। हार के बाद पहले से ही टीएमसी प्रशासन, भ्रष्टाचार के आरोपों और संगठनात्मक कमजोरियों जैसी आलोचनाओं का सामना कर रही थी। अब इस ‘साइनगेट’ कांड ने विपक्ष में बैठकर दोबारा खुद को मजबूत करने की कोशिश कर रही टीएमसी के सामने एक पहाड़ जैसी चुनौती खड़ी कर दी है।




